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Story By Deepshikha Singh, Guest Writer 
यूं तो हर कोई अपने कैरियर में आगे बढ़ना चाहता है लेकिन कुछ महिलाएं समाज में कुछ अलग करके अपना नाम कमाती है। उन्हीं में से है हिमाचल प्रदेश की सुलेखा राणा।
जहां आजकल हर कोई बस चका-चौंध की तरफ भागता है। वहीं दूसरी तरफ सुलेखा राणा ने स्पेशल बच्चों के लिए कुछ करना चाहा। वो भी स्पोर्टस के क्षेत्र में। स्पेशल ओलंपिक्स भारत की मैनेजर सुलेखा राणा ने बताया कि उनका अनुभव बहुत अच्छा रहा है। उन्होंने कहा उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। सिटी वुमन मैगजीन ने बात की सुलेखा राणा से उनके अनुभव और काम के बारे में। बातचीत के मुख्य अंश।
स्पेशल ओलंपिक्स से जुड़े कितना वक्त हो गया है?
यूं तो मैं स्पेशल ओलंपिक्स से 2005 में ही जुड़ी थी लेकिन बचपन से इस ही तरह कुछ अलग करने के बारें में ही सोचा था।
इन बच्चों के साथ इतने साल से आप काम कर रही है आपका अनुभव कैसा रहा?
बहुत अच्छा अनुभव रहा मेरा। इन बच्चों से हमेशा मुझे कुछ ना कुछ सीखने को मिला है। इसी अनुभव से कई परिस्थितियों को हैंडल करना सीखा हैं मैनें। अभी भी इन एथलीटों से काफी कुछ सीख रही हूं मैं। जहां हम हल्की सी मुसीबत आने पर भी हार मान लेते है। वहीं, दूसरी तरफ ये एथलीट हर मुसीबत का सामना करके आगे बढ़ते है।
कितना चैलेंजिंग होता है इन बच्चो को समझना और इन्हें संभालना?
शुरू में ये थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन जब आप काफी समय से इनसे जुड़कर या इन्हें समझकर काम करने लगते है तो अपने आप ये आसान होने लगता है।
इतने सारे गेम्स, काम्पीटिशन स्ट्रैस भी होता होगा कैसे मैनेज करती है आप ?
ये थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन जब आप कोई भी काम प्लानिंग के साथ करते है तो उसमें ज्यादा दिक्कत नहीं आती। मुश्किल जब आने शुरू हो ती है जब आप बिना प्लानिंग के काम करते है।
इन बच्चों के साथ बिताए कुछ पल जो आप हमारे साथ शेयर करना चाहेंगी?
ऐसे बहुत बिताए गए पल है इन बच्चों के साथ जो यादगार है। जिन्हें शायद शब्दों में पिरोना भी मुश्किल है। ये बच्चे बिना किसी शर्त और बिना किसी लालच के आपको प्यार करते है। ये आपको समझते है। ये हमेशा आपको कुछ ना कुछ सिखाते है। ये बताते है कि जिदंगी में कुछ भी असंभव नही है और इंसान अगर कुछ करना चाहें तो कुछ भी कर सकता है। ये बच्चे रियल हीरो है। इसके साथ ही मैं स्पेशल ओलंपिक्स भारत का भी धन्यवाद करना चाहूंगी कि उन्होंने मुझे ये मौका दिया।
आप हमारे जरिए लोगों को क्या बताना चाहेंगी ?
मैं बस यहीं कहना चाहूंगी ये बच्चें हमसे या समाज से कुछ नहीं चाहते। बस हम इन्हें बराबर समझें। हम इन्हें मौक़ा दें आगे बढ़ने का। समाज को इस सोच से बाहर आना चाहिए की ये हमारे जैसे नहीं है। कुछ बातों का ख्याल रखकर हम इन्हें आगे बढ़ा सकते है।